अख़बार में मंसूरी के वरिष्ठ नागरिकों के बारे में यह लेख पढ़ा। इसे पढ़ कर पता चलता है की ये लोग अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति कितने जागरूक हैं। इन लोगों ने जो उदहारण पेश किया है वो अनुकर्णीय और स्वागतयोग्य है।
Monday, May 31, 2010
एक मिसाल
अख़बार में मंसूरी के वरिष्ठ नागरिकों के बारे में यह लेख पढ़ा। इसे पढ़ कर पता चलता है की ये लोग अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति कितने जागरूक हैं। इन लोगों ने जो उदहारण पेश किया है वो अनुकर्णीय और स्वागतयोग्य है।
Sunday, May 23, 2010
भारतीय बच्चों की स्थिति और कुपोषण, एक समीक्षा

बच्चे, हँसते मुस्कुराते प्यारे प्यारे बच्चे। आपके, हमारे, हम सबके ये बच्चे जिनके बारे में कभी गुरुदेव रविन्द्रनाथ टेगोर ने कहा था, "इस दुनिया में आने वाला हर बच्चा ये ये सन्देश लेकर आता है की इश्वर अभी पूरी तरह से इंसान से निराश नहीं हुआ है"। स्वभाव से ही हम मानव अपने बच्चों से बहुत स्नेह करते हैं और उनका पालन पोषण पूरी जिम्मेदारी से करते हैं। वैज्ञानिक तथ्य भी इस बात को सच साबित करते हैं और फिर हम भारतीय तो स्वभावतः अधिक भावुक और संवेदनशील माने जाते हैं और इस बात पर गर्व भी करते हैं की पश्चिमी देशों के लोगों की तुलना में हम भारतवासी रिश्तों की बेहतर समझ रखते हैं और इंसान और इंसानियत को ज्यादा महत्व देते हैं। इतना सब होने के बाद भी इस मंच पर हमें भारतीय समाज में बच्चों की स्थिति की समीक्षा करने की जरुरत महसूस हुई तो वो निराधार भी नहीं है। मैं आपका ध्यान कुछ आंकड़ों की तरफ आकर्षित करना चाहूँगा जो मैंने एक हिंदी दैनिक से लिए हैं। इलाहबाद में राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन के 'स्कूल आई स्क्रीनिंग प्रोग्राम' के नतीजे बताते हैं हैं की वहां के २३,००० बच्चों की आँखों की जांच के दौरान ५४९ बच्चे मायोपिया और हाईपरमेत्रोपिया से ग्रसित मिले। यूनिसेफ और सी. आर. वाये के आंकड़ों से पता चलता है की ४८% भारतीय बच्चे कुपोषित हैं। आप शायद विश्वास न करें पर ये सच है की हमारे देश में आज भी २० लाख बच्चे अपना पहला जन्मदिन आने से पहले मर जाते हैं। अगर पूरे विश्व की बात करें तो विश्व का हर तीसरा कुपोषित बच्चा भारत में है और हर चौथे बच्चे में खून की कमी है। जन्म लेने वाले हर १००० बच्चों में ५० काल का ग्रास बन जाते हैं। हमारे प्रदेश उत्तर प्रदेश के हाल तो और भी बुरे हैं जहाँ ५०% प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर डॉक्टर ही नहीं हैं। अमूमन पांच साल तक के बच्चे को सभी टीके लग जाने चाहिए पर ऐसा नहीं हो पा रहा है। कुपोषण दूर करने के लिए आई . सी. ड़ी. एस . योजना पिछले ४० वर्षों से चल रही है पर ये एक शर्मसार करने वाला सत्य है की जो विभाग महिलाओं को यह सोच कर दिया गया था की उनमे पुरुषों की अपेक्षा बच्चों के प्रति अधिक ममता होगी, आज वही विभाग भ्रष्टाचार में गले तक डूबा हुआ है। जो पैसा अमेरिका के बच्चे और वहां के लोग जोड़ जोड़ कर वहां से यहाँ भारतीय बच्चों की देखभाल के लिए उपहार स्वरूप भेजते हैं वो पैसा यहाँ आते ही कब हमारे अपने समाज की यह पढ़ी लिखी जिम्मेदार और ममतामयी महिलाएं अंतर्धान कर देती हैं पता ही नहीं चलता। मैं यह तो नहीं कहूँगा की इस विभाग से जुडी सभी महिलाएं भ्रष्ट हैं पर हाँ यह जरुर हैं की जो इमानदारी से अपनी अपनी जिम्मेदारी निभा रही हैं उनकी संख्या बहुत कम है जो की चिंता का विषय है। इस सबके आलावा बच्चों के खिलाफ जितने अपराध हमारे यहाँ होते हैं शायद ही किसी खुद को विकसित देश समझने वाले देश में होते हों। निठारी के घाव अभी तक भरे नहीं हैं। यह घिनोना काण्ड भी हमें आईना दिखाता है। ऐसा भी नहीं है की सब गलत और बुरा ही हो रहा है हमारे यहाँ। बच्चों के लिए बहुत सी संस्थाएं बहुत अच्चा काम कर रही हैं। हमारी कोशिश होनी चाहिए की इन संस्थाओं को पूरा समर्थन दें और इनकी संख्या बढे। इसके आलावा कुछ जरुरी बदलाव हमें अपने अन्दर भी लाने होंगे। बच्चों को सिर्फ उनके माता पिता और परिवार की जिम्मेदारी समझना हमें छोड़ना होगा। हर बच्चा पूरे समाज की जिम्मेदारी होता है न की सिर्फ अपने परिवार की। जरुरत है हर जरूरतमंद बच्चे को प्यार देने की ताकि हर बच्चे का पूरा विकास हो। जब ऐसा होगा तब हमारे बच्चे स्वस्थ होंगे, हमारा समाज एक स्वस्थ समाज, और हमारा देश सही अर्थों में एक विकसित देश कहलायेगा।
Saturday, May 22, 2010
स्वागतम
प्रोजेक्ट हील में आपका स्वागत है। प्रोजेक्ट हील एक प्रयास है उनकी आवाज़ आप तक पहुँचाने का जिनकी आवाज़ आज के भाग दौड से भरे जीवन में दब कर रह गई है। उनके अधिकारों के बारे में बात करने का ये मंच है जिनके अधिकारों को लेकर हमारा समाज उतना सजग नहीं जितना की एक स्वस्थ समाज को होना चाहिए। ये आवाज़ है हमारे और आपके, हम सबके बच्चों की, ये बच्चे जो हमारा और हमारे देश का भविष्य हैं, उनके आज को लेकर हम एक समाज के रूप में कितने गंभीर हैं? यह मंच है उन मुद्दों को उठाने का जो हमारे बच्चों के बचपन से जुड़े हैं और साथ ही जुड़े हैं अपने समाज के लिए बेहतर भविष्य के उस वादे से जो हमारे बुजुर्गों ने एक नोवोदित राष्ट्र के प्रबुद्ध नागरिकों के तौर पर अपने आपसे स्वाधीनता मिलने के समय किया था, एक सभ्य और सुसंस्कृत समाज बनाने का वादा। यह मंच स्वर देने का एक प्रयास है हमारे उन बुजुर्गों की भावनाओं को जो हमारा भविष्य बनाने के लिए अपने आज को दांव पर लगाने में ज़रा भी न हिचके पर जिनके आज को लेकर हम कितने गंभीर हैं ये देश में तेज़ी से बढते हुए वृद्धाश्रमों को देख कर जाना जा सकता है। साथ ही साथ इस ब्लॉग को बनाने का एक लक्ष्य यह भी है की देश में हो रही उन सार्थक सामाजिक पहलों को और हिम्मती और होनहार लोगों के उन सराहनीय कामों को आपके सामने लाया जाये जिन्हें हमारा मीडिया बड़ी खबर नहीं बनाता। यह एक पड़ाव है ठहरने का और ठहर कर सोचने का की जिस दौड भाग में हम और आप सुबह से शाम तक उलझे रहते हैं क्या वो इतनी ज़रुरी है की उसके लिए हम अपने बच्चों से और अपने बड़े बुजुर्गों से कट जाएँ? क्या यही वह विकास है जिसे एक समाज के तौर पर पाने की हम कामना करते थे? सवाल बड़ा है और इसका उत्तर हमें खुद खोजना पड़ेगा, आत्मचिंतन से और आत्ममंथन से। प्रोजेक्ट हील इसी दिशा में एक प्रयास है। आपसे विनम्र अनुरोध है की आप इस प्रयास से जुड़ें और अपने विचार, लेख, और आलोचनाये हमें भेजें। इस बात की प्रबल संभावना है की कई और आवाजों की तरह प्रोजेक्ट हील के जरिये उठाई गई आपकी और हमारी आवाज़ भी इस शोरगुल में नक्कारखाने में तूती की आवाज़ साबित हो पर मेरा मानना है की ये फिर भी चुप रहने से बेहतर होगा।
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